नई दिल्ली। स्वास्थ्य बीमा लेने वाले लोगों के लिए उपभोक्ता आयोग का एक अहम फैसला राहत की उम्मीद जगाता है। बीमा कंपनी किसी ग्राहक पर पहले से ब्लड प्रेशर (बीपी) होने और बीमारी की जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर मनमाने ढंग से क्लेम खारिज नहीं कर सकती। इसके लिए कंपनी को ठोस साक्ष्य पेश करने होंगे। केवल जांचकर्ता के बयान के आधार पर बीमा दावा अस्वीकार करना उचित नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
मामला रोहिणी निवासी 65 वर्षीय यशपाल बहल से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2019 में 7.5 लाख रुपये का फैमिली मेडिक्लेम बीमा लिया था। वर्ष 2021 में इलाज के दौरान उनके 4,15,332 रुपये और 55,673 रुपये खर्च हुए। इसके बाद उन्होंने बीमा कंपनी से क्लेम मांगा, लेकिन कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि बीमाधारक पिछले चार वर्षों से ब्लड प्रेशर की समस्या से पीड़ित थे और उन्होंने पॉलिसी लेते समय इसकी जानकारी नहीं दी थी।
कंपनी ने 12 नवंबर 2021 को बीमा पॉलिसी भी रद्द कर दी। इसके बाद मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा।
उपभोक्ता आयोग ने साक्ष्यों पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान सेंट्रल जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की पीठ ने पाया कि बीमा कंपनी चार साल से बीपी होने के दावे के समर्थन में कोई ठोस मेडिकल पर्चा, जांच रिपोर्ट या उपचार संबंधी रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी। आयोग के समक्ष केवल जांचकर्ता का बयान पर्याप्त आधार नहीं माना गया।
पीठ में अध्यक्ष दिव्या ज्योति जयपुरियार और सदस्य डॉ. रश्मि बंसल शामिल थीं।
बीमा कंपनियों को साबित करनी होगी बीमारी छिपाने की बात
आयोग के अनुसार, यदि बीमा कंपनी यह आरोप लगाती है कि ग्राहक को पॉलिसी लेने से पहले किसी बीमारी की जानकारी थी और उसने जानबूझकर इसे छिपाया, तो कंपनी को इस आरोप के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य देने होंगे। बिना प्रमाण के केवल आशंका या आरोप के आधार पर क्लेम रोकना उचित नहीं है।
बीमा धारकों के लिए क्या है इसका मतलब?
यह फैसला स्वास्थ्य बीमा ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है। यदि किसी बीमा कंपनी ने पहले से बीमारी होने का आरोप लगाकर आपका क्लेम खारिज किया है, तो आप कंपनी से लिखित कारण और संबंधित मेडिकल साक्ष्य मांग सकते हैं। जरूरत पड़ने पर बीमा लोकपाल या उपभोक्ता आयोग के समक्ष शिकायत भी की जा सकती है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि बीपी, शुगर या अन्य पहले से मौजूद बीमारियों से जुड़े हर क्लेम का भुगतान अनिवार्य होगा। प्रत्येक मामले में पॉलिसी की शर्तें, बीमारी की जानकारी और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।







