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203 साल पुरानी परंपरा का होगा भव्य प्रदर्शन, 12 किलो की जलती बनाटी घुमाकर हैरतअंगेज करतब दिखाएंगे बीकानेर के युवा

On: November 5, 2026 1:01 PM
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बीकानेर। बीकानेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में शामिल बनाटी घुमाने की परंपरा एक बार फिर दीपोत्सव पर जीवंत होने जा रही है। बारह गुवाड़ चौक में करीब 203 वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा के तहत 7 नवंबर 2026 को रात 9 बजे जलती हुई मशालों के साथ हैरतअंगेज करतबों का प्रदर्शन किया जाएगा। आयोजन को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और प्रतिभागी पिछले एक महीने से अभ्यास में जुटे हुए हैं।

आग के बीच संतुलन और फुर्ती का अनोखा प्रदर्शन

बनाटी घुमाना केवल एक खेल नहीं, बल्कि शारीरिक क्षमता, साहस, संतुलन और वर्षों के अभ्यास का संगम है। इसमें लकड़ी के दोनों सिरों पर आग से जलती मशालें बांधी जाती हैं, जिनका कुल वजन लगभग 8 से 12 किलोग्राम तक होता है। प्रतिभागी इस जलती बनाटी को सिर के ऊपर, पैरों के नीचे और शरीर के चारों ओर तेजी से घुमाकर विभिन्न करतब दिखाते हैं। इसके लिए अनुभवी उस्तादों के मार्गदर्शन में नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है।

खास तरीके से तैयार होती है मशाल

बनाटी तैयार करने की प्रक्रिया भी काफी मेहनत भरी होती है। ईश्वर महाराज और शेर महाराज के अनुसार, लकड़ी के दोनों सिरों पर सूत के कोड़े बांधकर उन्हें करीब दो दिनों तक तेल में डुबोकर रखा जाता है। दोनों तरफ वजन और आकार समान रखा जाता है, ताकि बनाटी घुमाते समय संतुलन बना रहे। पहले मशाल तैयार करने में जूट का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब तेल के उपयोग से आग अधिक समय तक जलती रहती है।

बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक निभाते हैं परंपरा

इस आयोजन की खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग उम्र के लोग उत्साह के साथ हिस्सा लेते हैं। बनाटी के साथ करतब दिखाने वाले प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाने के लिए आसपास के मोहल्लों के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। तेज आग और भारी वजन के बीच संतुलन बनाकर प्रदर्शन करना बेहद अभ्यास और सावधानी का काम है। आयोजकों के अनुसार, वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में सुरक्षा और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाता है।

तीन महानुभावों की स्मृति में होता है आयोजन

यह साहसिक आयोजन सनाथा महाराज, फागणिया मारजा और पागा मारजा की स्मृति में किया जाता है। वर्तमान में ईश्वर महाराज और बारह गुवाड़ चौक के गणमान्य लोगों के सानिध्य में इस परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है। दीपावली के अवसर पर होने वाला यह प्रदर्शन बीकानेर की लोक संस्कृति, पारंपरिक खेलों और सामूहिक सहभागिता की एक विशिष्ट पहचान बना हुआ है।

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