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ऑर्थोबायोलॉजिक्स तकनीक हड्डी रोग उपचार में साबित हो रही वरदान : डॉ. अजय कपूर

On: June 23, 2026 1:16 PM
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ऑर्थोबायोलॉजिक्स तकनीक हड्डी रोग उपचार में साबित हो रही वरदान : डॉ. अजय कपूर

बीकानेर, 23 जून। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में तकनीक और शोध ने क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। हड्डी रोग चिकित्सा में ऑर्थोबायोलॉजिक्स (Orthobiologics) एक ऐसी आधुनिक तकनीक के रूप में उभरी है, जिसने उपचार के पारंपरिक तरीकों को नई दिशा दी है। यह तकनीक न केवल हड्डियों और जोड़ों की समस्याओं के समाधान में सहायक है, बल्कि शरीर की प्राकृतिक उपचार क्षमता को बढ़ाकर रिकवरी की प्रक्रिया को भी तेज करती है।

पीबीएम अस्पताल ट्रॉमा सेंटर स्थित ऑर्थो बायोलॉजिकल रिसर्च सेंटर (OBRC) के प्रभारी डॉ. अजय कपूर ने बताया कि ऑर्थोबायोलॉजिक्स वे जैविक पदार्थ हैं, जिनका उपयोग हड्डियों, मांसपेशियों, टेंडन और लिगामेंट की चोटों को तेजी से ठीक करने के लिए किया जाता है। ये पदार्थ शरीर के प्राकृतिक ऊतकों से प्राप्त किए जाते हैं। सरल शब्दों में कहें तो यह तकनीक शरीर के स्वस्थ सेल्स का उपयोग कर क्षतिग्रस्त हिस्से को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया है।

उन्होंने बताया कि इस पद्धति में मरीज के रक्त को लेकर उसे सेंट्रीफ्यूज किया जाता है, जिससे प्लेटलेट्स की सांद्रता बढ़ जाती है। इसके बाद इसे चोटग्रस्त स्थान पर इंजेक्ट किया जाता है, जिससे ऊतकों की मरम्मत और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। वहीं स्टेम सेल्स, जो शरीर की विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में परिवर्तित होने की क्षमता रखते हैं, उन्हें बोन मैरो अथवा फैट टिश्यू से प्राप्त कर उपचार में उपयोग किया जाता है।

डॉ. कपूर के अनुसार कई ऐसे मामले हैं, जिनमें पहले सर्जरी अनिवार्य मानी जाती थी, लेकिन अब ऑर्थोबायोलॉजिक्स के माध्यम से बिना चीर-फाड़ के प्रभावी उपचार संभव हो रहा है। चूंकि इसमें मरीज के अपने सेल्स का उपयोग किया जाता है, इसलिए एलर्जी अथवा बाहरी संक्रमण का खतरा भी बेहद कम रहता है।

उन्होंने बताया कि ऑस्टियोआर्थराइटिस, गठिया, टेनिस एल्बो और लिगामेंट की चोटों जैसी समस्याओं में यह तकनीक अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही है। खिलाड़ियों और एथलीट्स के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि इससे खेल संबंधी चोटों से उबरने का समय काफी कम हो जाता है।

डॉ. कपूर ने कहा कि यद्यपि ऑर्थोबायोलॉजिक्स एक आशाजनक तकनीक है, लेकिन इसकी लागत और विभिन्न मरीजों पर इसके प्रभाव अभी भी शोध का विषय हैं। भारत जैसे देश में इसकी उपलब्धता और जन-जागरूकता बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है। भविष्य में रीजेनरेटिव मेडिसिन के विकास के साथ यह तकनीक हड्डी रोग चिकित्सा का प्रमुख आधार बन सकती है।

उन्होंने बताया कि बीकानेर के पीबीएम अस्पताल ट्रॉमा सेंटर में संचालित प्रदेश के प्रथम ऑर्थो बायोलॉजिकल रिसर्च सेंटर (OBRC) में इस पद्धति पर शोध कार्य और उपचार लगातार जारी है, जिससे मरीजों को अत्यंत सकारात्मक एवं क्रांतिकारी लाभ मिल रहे हैं।

— डॉ. अजय कपूर
प्रभारी, OBRC ट्रॉमा सेंटर ओपीडी, बीकानेर।

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